लिखने ही भर को तुम मत लिखना
हो सके जिस पे 'अमल' लिखना
पाती पढ़े बहुत दिन हुए
कैसी है चाची 'फसल' लिखना
किसी का लिखा अब भाता नहीं है
शुरू खुद किया है 'गजल' लिखना
बहुत लिख चुके आग नफरतों के
बुझा जो सके अब वो 'जल' लिखना
जो है खरा वो ही बड़ा है
बुरा है किसी की 'नक़ल' लिखना
रविवार, 28 मार्च 2010
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