खिलौने ,घरौंदे ,घर की न पूछो
इस आंधी में अब तो शहर टूटते हैं
उस गाँव में हर साल मरते हैं लोग
पता न चला क्यूँ नहर टूटते हैं
बनाना भी चाहो दोबारा न बनते
यकीं के महल इस कदर टूटते हैं
लाओ कोई नया शब्द लाओ
घिसे से गजल के असर टूटते हैं
वहां की जमीं परती कहाँ है
सजते हैं मौल जो घर टूटते हैं .......
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
प्रत्येक शेर गहरे भाव लिए - - लाजवाब. "बात बोल रही है और भेद भी खोल रही है" - बधाई
जवाब देंहटाएं