रविवार, 28 मार्च 2010

लिखने ही भर को तुम मत लिखना
हो सके जिस पे 'अमल' लिखना

पाती
पढ़े बहुत दिन हुए
कैसी है चाची 'फसल' लिखना

किसी का लिखा अब भाता नहीं है
शुरू खुद किया है 'गजल' लिखना

बहुत लिख चुके आग नफरतों के
बुझा जो सके अब वो 'जल' लिखना

जो है खरा वो ही बड़ा है
बुरा है किसी की 'नक़ल' लिखना

6 टिप्‍पणियां:

  1. बरसों से वनवास झेल रहा हूँ पेट की खातिर
    जन्मभूमि से दूर देश विदेश, यहाँ वहाँ
    कोई ठहराव नहीं दिखता दूर तक.
    जुड़ जाता हूँ किसी भी अजनबी से जब कभी
    उसके नाम के साथ देखता हूँ
    अपनी जन्मभूमि का नाम प ट ना.
    इन तीन अक्षरों में समाई ममता
    उस अजनबी से जोड़्ती है
    याद दिलाती है दूर जाती हुई गंगा की
    सूखे गाँधी मैदान की और
    मेरी ही तरह अजनबीहोते मेरे अपने
    सायन्स कॉलेज की..
    keep it up.. the depth in your poems can be felt from heart only!!

    जवाब देंहटाएं
  2. magar natasha Ji
    lagaataar padhate rahane se hee vichaar paidaa hotaa hai.
    please dusare ko padhate rahen.ye jarureekaam hai.its our personal request.
    APNI MAATI
    MANIKNAAMAA

    जवाब देंहटाएं
  3. सभी शेर समसामयिक और सच्चे भाव लिए - यही सोच बनी रहे - हार्दिक शुभकामनाएं
    "लिखने ही भर को तुम मत लिखना
    हो सके जिस पे 'अमल' लिखना"
    बहुत जरुरी है आज के वक़्त में जहाँ कथनी और करनी में बहुत अंतर है.

    जवाब देंहटाएं
  4. अच्छा लिखा और अच्छा लिखो ।
    प्रशंसनीय ।

    जवाब देंहटाएं
  5. पाती पढ़े बहुत दिन हुए
    कैसी है चाची 'फसल' लिखना
    bahut knoob poori gazal lazavab
    ----sahityasurbhi.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  6. नताशा
    तुम्‍हारे शब्‍दों की दुनिया में आया। हैरान हुआ कि इतनी मैच्‍योर और गहरी भावभूमि वालीरचनाओं से अब तक मेरा परिचय क्‍यों नहीं हुआ। ग़ज़लें तो वाकई ग़ज़ब हैं। इन्‍हें बड़े आकाश की जरूरत है। ब्‍लाग तक सीमित मत रखो। मेरी मंगल कामनाएं।सूरज

    जवाब देंहटाएं